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Thursday, 28 April 2016

अब रहा नहीं डर, किसी डर से मुझे..





ये क्या मिला शीशे के घर से मुझे,
लगता है डर हर एक पत्थर से मुझे..

किस की ताक़त थी मारे ज़हर से मुझे,
मगर मार डाला उसने अपनी नज़र से मुझे..

में आसमां की छत भी चूम सकता हूँ,
नवाज़ दे परिन्दा कोई अपने पर से मुझे..

वो मेरे दर पर आया है लेने उजाला,
जो डराता था कभी अँधेरे सफर से मुझे..

गलती से कहीं सच बोल दिया था, 
समझाने आये लोग घर घर से मुझे..

मैंने काँटों के साथ रिश्ते निभाए, 
बदले में फूल मिले रहगुज़र से मुझे..

ज़हर पी लो, अमृत ज़माने को दो,
बड़ी अच्छी सीख मिली शंकर से मुझे..

खतरों से खेलने की पड़ गयी है आदत, 
अब रहा नहीं डर किसी डर से मुझे..




Tuesday, 12 April 2016

A Perception Beyond the Physical

If you are really interested in knowing life in its depth, you must see how to enhance your perception!


Experiencing Something Beyond The Physical


Man has spent too much time trying to think about things to which he has no access. When you try to think about that which you have no access to, towards which you have no perception, all you can do is speculate. When you do excessive speculation without any fundamentals, it amounts to hallucination. Because of this, a large part of religion and spirituality in the world has become purely hallucinatory.

This moment, if you fall asleep, suddenly people around you will disappear, the world will disappear and you also disappear. You are still alive, everyone around is alive, the existence is on, but in your experience everything disappeared because the five sense organs have shut down. Right now your whole perception of life is limited to five sense organs – seeing, smelling, hearing, tasting, touching. These sense organs, in the very nature of things, can perceive only that which is physical.

It does not matter whether you want to know the process of creation or you just want to live peacefully, what you need to do is enhance this perception to its ultimate level, to know the Ultimate, or at least enhance your perception to some level where your body, and mind, and emotion, and energy happen the way you want them.



An Inner Perception

Anything that is not in your awareness does not exist for you. And only what you are aware of, you can handle and do things about. If you carefully examine it, you will see a large part of you is not in your awareness. If you bring more into your awareness, an inner perception of life not limited to the five sense organs, you will see suddenly your life begins to happen on all levels the way you want it.

When I say “an inner perception,” I am not referring about some airy things. Let us start from the mundane. If your perception is beyond the senses, and food appears in front of you, you can simply know how this food will behave in your system. But this perception is today being lost by human beings.

From something as simple as food to something like the ultimate possibility, the inner perception would bring a completely new dimension into one’s life.

All the activity that we are doing in our lives whether you are a doctor, a policeman, an engineer or whatever you are, fundamentally, your perception of what is right now in front of you decides the effectiveness of who you are, and how much you do on this planet.

What is there in front of me, I perceive it as it is and that is it. There is no need to carry the burden of knowledge on your head if your perception is keen enough. So perception can be raised to various levels through certain inner instruments. “Is it very difficult? Can I rise beyond my senses? Do I have to withdraw to a Himalayan cave to do this?”

Any human being who is willing to dedicate just a few minutes of his life per day can begin to know this. Because it is not sitting somewhere in the Himalayas, it is within you. What is within you is not inaccessible to you. You are just too busy and enamored with what is happening outside. You never paid any attention to the inside. It is just lack of attention which has denied people this possibility.








Friday, 13 February 2015

एक मुट्ठी आसमान चाहिए




यहां सफर कैसा भी हो,
सभी को रास्ता एक, आसान चाहिए।

यहां मंज़िल कैसी भी हो,
लोगो को तो बस एक, पहचान चाहिए।

सोने वाले सपनों से थक कर सो गए,
अब हर किसी को महल एक, आलिशान चाहिए।

कोशिश तो करते हैं सब अपने लिए जीने की,
पर यहां जीने के लिए भी, एक मुट्ठी आसमान चाहिए।


Monday, 9 February 2015

रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..




टूट कर बिखरते जज़्बात देखे, तो अपने अरमां को भी संवरते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


खानाबदोशों को ग़र रुकते देख़ा, तो गरीबोँ को दर-दर भी भटकते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


देखा अपनों को भी कठिनाई में, तो अजनबी को अपने पास भी हँसते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


ईमान के पुजारी भी मिले, तो पैसों की ताकत से ज़मीर भी गिरते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


कभी असंभव भी संभव सा हुआ, तो कभी ज़रूरी काम भी टलते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


अमर-प्रेम की दास्तां देखी, तो रिश्तें-नातें प्यार की बातें, इन्हे भी खूब सिसकते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


कभी मिसाल बना गैरो का अपनापन, तो कभी अपनों को भी छलते देखा..
रंग बदलती दुनियाँ देखी, मैंने खुद को भी रंग बदलते देखा..


Saturday, 17 January 2015

यही दर्द मुझे अब जीने की वजह देगा




न जाने क्यूँ ये जिंदगी आज, उन चंद ख्वाहिशों की मोहताज है.
और, न जाने क्यूँ आज इन खामोशीयों मे भी आवाज़ है।
इस अंतरात्मा से बार-बार आती एक आवाज़ है,
जो हर पल दे रही एक अज़ाब है
 ये अज़ाब ही है, जो बुन रहा एक ख्वाब आज फिर,
उस ख्वाब का ही पंछी हूँ मैं, 
जो हो रहा है मेरे साथ, उसका साक्षी हूँ मैं
ये वही हूँ मैं,
जो उस दर्द का गुनहगार है,
पर हर उस खुशी का हकदार है
जो अब तक उससे जुदा है,
जुदा है तब तक,
जब तक खुद से किया ये वादा पूरा ना हो,
जब तक ये जागती आँखों से देखा ख्वाब पूरा ना हो,
जब तक इस नादान परिंदे की उड़ान पूरी ना हो।
माना ये दर्द मुझे जीने नहीं देगा,
पर मुझे पूरा विश्वास है,
 ये वक़्त आज फिर मुझे एक मौका देगा,
यही दर्द मुझे अब जीने की वजह देगा।
यही दर्द मुझे अब जीने की वजह देगा।


Saturday, 27 December 2014

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है




जूनून इतना है इन पैरो में भरा,
फिर क्यों रहूं में दर-दर खड़ा..
आज जब मेरे सामने है, इतना रास्ता पड़ा.. 
जब तक मंजिल ना पा सकूँ, तब तक मुझे ना आराम है,
क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया.. कुछ बोझ अपना बँट गया..
अच्छा हुआ तुम मिल गई, कुछ रास्ता यूँ ही कट गया..
क्या राह में परिचय दूँ, राही हमारा नाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

जीवन अधूरा लिए हुए, पाता कभी खोता कभी..
आशा निराशा से घिरा, हँसता कभी रोता कभी..`
गति-मति ना हो अवरूद्ध, इसका ध्यान सुबह-शाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

इस वक़्त के प्रहार में, किसको नहीं बहना पड़ा..
सुख-दुख हमारी ही तरह, किसको नहीं सहना पड़ा..
फिर क्यों कहु बार-बार की मेरा ही मन नाकाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा..
प्रत्येक डगर पर कुछ न कुछ, रोड़ा अटकता ही रहा..
निराशा क्यों हो मुझे? अरे जीवन ही इसी का नाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे, कुछ बीच ही से मुड़ गए..
गति न जीवन की रूकी, जो गिर गए सो गिर गए..
रहे हर दम जो, उसी की सफलता को सलाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।








Saturday, 27 September 2014

सफलता की "पीएचडी"

आप ज़िन्दगी में सफलता और आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपको एक ख़ास पीएचडी (PhD) करनी होगी।। इसमें पी यानी पैशन (P), एच यानी हंगर (h) और डी यानी डिसिप्लिन (D) है.. 

लीडरशिप के लिए आपको करनी होगी ख़ास पीएचडी। इस पीएचडी में शामिल हैं आपके भीतरी गुण।।




जब आप किसी काम को पसंद करते हैं तो वह पैशन बन जाता है। पैशन के कारण आपको पता ही नहीं लगता की उस काम में आपने कितना समय खर्च किया। आप काम को बेस्ट तरीके से करने का प्रयास करते हैं। हम ज़िन्दगी में छोटा बड़ा कोई भी काम कर ले, पर यह ज़रूरी है की हम अपने पैशन या जूनून को फॉलो करे। जब हम ये सोचते हैं की सफलता के लिए क्या ज़रूरी है तब मूल्य, प्रतिभा, महत्वाकांक्षा, बुद्धि, अनुशासन, दृढ़ता और भाग्य आदि शब्दों में ही रह जाते हैं। हम में से कई अक्सर जूनून या पैशन को इस लिस्ट में रखना भूल जाते हैं। इस तरह की उत्साह की शक्तिशाली भावना हम सभी के अंदर है, ज़रूरत है तो बस उसे जगाने की.. 
पैशन की कोई उम्र नहीं होती, अगर इंसान अपनी मंजिल को पैशन बना ले, तो उसे आगे बढने से कोई नहीं रोक सकता। 

अब बात करते हैं हंगर यानी भूख की। आपको अपना लक्ष्य हासिल करने की कितनी भूख है? अगर आप पूरी शिद्दत के साथ अपना टारगेट पूरा करना चाहते हैं तो कड़ी मेहनत करते हैं। बिना शिद्दत के आप बीच राह में रुक सकते हैं। शिद्दत के साथ काम न करने से आप काम से ऊब सकते हैं। इसीलिए आप वही काम करे, जिसे करने की आपके अंदर भूख हो। भूख चाहे खाने की हो या किसी और चीज़ की, ये इंसान से कुछ भी करवा लेती है.. ये बात तो आप भी अच्छी तरह से जानते हैं। 

आखिर में नंबर आता है डिसिप्लिन का। हो सकता है की आपके अंदर जोश और भूख हो, पर यदि आप अनुशासित नहीं हैं तो आप सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। अनुशासन के लिए मन को काबू करना पढता है। 
"किसी भी फील्ड में मुकाम हासिल करने के लिए लाइफ में डिसिप्लिन होना बहुत जरूरी है।"
बिना अनुशासन के आप काम को बीच में छोड़कर दूसरी बातों में लग सकते हैं। लक्ष्य से भटकने पर अनुशासन ही आपको सही राह पर ला सकता है..   



Monday, 28 April 2014

कुछ पीछे छूटे हमराहियों कि याद में




इन अन्जानी राहों में, कुछ अनजाने गम हैं,
सब कुछ है पास अब, फ़िर भी तनहा हम हैं,
हर ख़ुशी अधूरी है, जो तुम सब नहीं ज़िन्दगी में,
क्यूंकि, आज इस ज़िन्दगी में कुछ शख्स कम है।।

आज फिर से वही एहसास, ज़हन मैं लौट कर आया है,
भूल चुके थे जिन्हे हम, आज लगा उन्ही का साया है,
आज भी याद है वो दिन, जब हमारी राहें बदली थी,
जब वक़्त ने कहा की उठ जा, अब जाने का समय आया है।।

पता ही नहीं चला कि, कुछ पल में हम सब इतनी दूर हो गए,
ऐसा भी क्या हुआ की, एक दूसरे से दूर जाने को मजबूर हो गये,
 इस रंगीन दुनिया से तुम सब ने, खुद ही नाता तोड़ लिया,
और ऐसा लगा जैसे, यहाँ हर रंग खुद हमारी ज़िन्दगी से दूर हो गए।।

सबके घरों में रंग थे, सिर्फ़ हमारे बाग़बान के फूल ही बेरंग थे,
हर तरफ खुशियाँ थीं, और यहाँ तो दिल के रास्ते ही तंग थे,
ये  माना कि ज़िन्दगी तो आगे बढ़ती रहेगी, पर वो बात कहाँ,
इसकी तो रौनक और बात ही अलग थी, जब हम सब संग थे।।

आज फिर ये रंगीन मौसम है, और साथ तुम्हारी याद है,
तुम सब खुश रहो, बस यही मेरे दिल कि फ़रियाद है,
माना कि ज़िन्दगी में शायद अब, तुम चाह कर भी नहीं हो,
फिर भी हमारे जज़्बातों का शहर, तुम्हारी यादों से ये आबाद है।।

एक वादा है कि, हर रंग में हमेशा एक रंग तुम्हारा होगा,
ये कमी भी दूर हो ही जाएगी, जब हाथों में हाथ तुम्हारा होगा,
हक़ीकत का तो पता नहीं, पर यादों में हमे जरुर रखना,
और भी महफ़िले जमेगी कल, ग़र फिर से साथ तुम्हारा होगा।।


Monday, 14 April 2014

ज़िन्दगी यूँ ही रेत सी फिसलती जा रही है आजकल




वो पुरानी यादें, यूँही सिमटती जा रही है आजकल,
बस चंद लम्हों में, बिखरती जा रही है आजकल... 

एक चिंगारी उठा लाये थे कभी अपनी ही बेसुधी में,
वही आग बन कर हमें जला रही है आजकल... 

ये कदम तो पहले भी बहके हैं होश खो कर,
मगर, ये राहें खुद बहकती जा रही है आजकल... 

अच्छे और बुरे, ज़िन्दगी में लोग कितने ही मिले,
धुंधली सी एक याद होती जा रही है आजकल... 

जिस ज़मीं पर छोड़ आए थे निशाँ क़दमों के हम,
वो ज़मीं ही खिसकती जा रही है आजकल... 

याद शाम की कभी आना कोई हैरत नहीं मगर,
हर घड़ी उस शाम में ढ़लती जा रही है आजकल... 

ज़िन्दगी के थे कई मकसद हमारे भी अज़ीम मगर,
ज़िन्दगी यूँ ही रेत सी फिसलती जा रही है आजकल... 

Friday, 31 January 2014

किसी कि दुआओं ने आज फिर बचाया है




खुशियां औरों को दे कर, हमने ये इनाम कमाया है.. 
मिली जिनके दिल में जगह, उन्हें पलकों पर बिठाया है...

ये जानते हैं हम, कि वो सिर्फ एक साया है.. 
पर हमेशा उस सायें का ही पीछा करते खुद को पाया है... 

जिस ख्वाब को देख कर, कोई और ख्वाहिश ही ना रही.. 
पूरी ज़िन्दगी उसी एक ख्वाब ने रुलाया है... 

दिल में ही रह गया था, एक तमन्ना का नाम-ओ-निशाँ.. 
बस, वही मुझे फिर से अपने शहर खींच लाया है... 

हमारी आँखों का सुकून था, वो अजनबी चेहरा.. 
इसीलिए, हमने अपनी ख़ुशी से ये धोखा खाया है... 

आज दिल के उस दर्द को भी, मिला ही लिया इन लफ्ज़ो में.. 
तब कहीं जाकर, इन शब्दों में ये रंग आया है... 

सलामती का तो कोई रास्ता, था ही नहीं यारा.. 
मुझे तो किसी कि दुआओं ने आज फिर बचाया है... 
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