Saturday, 17 January 2015

यही दर्द मुझे अब जीने की वजह देगा




न जाने क्यूँ ये जिंदगी आज, उन चंद ख्वाहिशों की मोहताज है.
और, न जाने क्यूँ आज इन खामोशीयों मे भी आवाज़ है।
इस अंतरात्मा से बार-बार आती एक आवाज़ है,
जो हर पल दे रही एक अज़ाब है
 ये अज़ाब ही है, जो बुन रहा एक ख्वाब आज फिर,
उस ख्वाब का ही पंछी हूँ मैं, 
जो हो रहा है मेरे साथ, उसका साक्षी हूँ मैं
ये वही हूँ मैं,
जो उस दर्द का गुनहगार है,
पर हर उस खुशी का हकदार है
जो अब तक उससे जुदा है,
जुदा है तब तक,
जब तक खुद से किया ये वादा पूरा ना हो,
जब तक ये जागती आँखों से देखा ख्वाब पूरा ना हो,
जब तक इस नादान परिंदे की उड़ान पूरी ना हो।
माना ये दर्द मुझे जीने नहीं देगा,
पर मुझे पूरा विश्वास है,
 ये वक़्त आज फिर मुझे एक मौका देगा,
यही दर्द मुझे अब जीने की वजह देगा।
यही दर्द मुझे अब जीने की वजह देगा।


Saturday, 27 December 2014

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है




जूनून इतना है इन पैरो में भरा,
फिर क्यों रहूं में दर-दर खड़ा..
आज जब मेरे सामने है, इतना रास्ता पड़ा.. 
जब तक मंजिल ना पा सकूँ, तब तक मुझे ना आराम है,
क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया.. कुछ बोझ अपना बँट गया..
अच्छा हुआ तुम मिल गई, कुछ रास्ता यूँ ही कट गया..
क्या राह में परिचय दूँ, राही हमारा नाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

जीवन अधूरा लिए हुए, पाता कभी खोता कभी..
आशा निराशा से घिरा, हँसता कभी रोता कभी..`
गति-मति ना हो अवरूद्ध, इसका ध्यान सुबह-शाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

इस वक़्त के प्रहार में, किसको नहीं बहना पड़ा..
सुख-दुख हमारी ही तरह, किसको नहीं सहना पड़ा..
फिर क्यों कहु बार-बार की मेरा ही मन नाकाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा..
प्रत्येक डगर पर कुछ न कुछ, रोड़ा अटकता ही रहा..
निराशा क्यों हो मुझे? अरे जीवन ही इसी का नाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे, कुछ बीच ही से मुड़ गए..
गति न जीवन की रूकी, जो गिर गए सो गिर गए..
रहे हर दम जो, उसी की सफलता को सलाम है..

क्यूंकि ज़िन्दगी में बढ़ते रहना हमारा काम है।








Saturday, 27 September 2014

सफलता की "पीएचडी"

आप ज़िन्दगी में सफलता और आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपको एक ख़ास पीएचडी (PhD) करनी होगी।। इसमें पी यानी पैशन (P), एच यानी हंगर (h) और डी यानी डिसिप्लिन (D) है.. 

लीडरशिप के लिए आपको करनी होगी ख़ास पीएचडी। इस पीएचडी में शामिल हैं आपके भीतरी गुण।।




जब आप किसी काम को पसंद करते हैं तो वह पैशन बन जाता है। पैशन के कारण आपको पता ही नहीं लगता की उस काम में आपने कितना समय खर्च किया। आप काम को बेस्ट तरीके से करने का प्रयास करते हैं। हम ज़िन्दगी में छोटा बड़ा कोई भी काम कर ले, पर यह ज़रूरी है की हम अपने पैशन या जूनून को फॉलो करे। जब हम ये सोचते हैं की सफलता के लिए क्या ज़रूरी है तब मूल्य, प्रतिभा, महत्वाकांक्षा, बुद्धि, अनुशासन, दृढ़ता और भाग्य आदि शब्दों में ही रह जाते हैं। हम में से कई अक्सर जूनून या पैशन को इस लिस्ट में रखना भूल जाते हैं। इस तरह की उत्साह की शक्तिशाली भावना हम सभी के अंदर है, ज़रूरत है तो बस उसे जगाने की.. 
पैशन की कोई उम्र नहीं होती, अगर इंसान अपनी मंजिल को पैशन बना ले, तो उसे आगे बढने से कोई नहीं रोक सकता। 

अब बात करते हैं हंगर यानी भूख की। आपको अपना लक्ष्य हासिल करने की कितनी भूख है? अगर आप पूरी शिद्दत के साथ अपना टारगेट पूरा करना चाहते हैं तो कड़ी मेहनत करते हैं। बिना शिद्दत के आप बीच राह में रुक सकते हैं। शिद्दत के साथ काम न करने से आप काम से ऊब सकते हैं। इसीलिए आप वही काम करे, जिसे करने की आपके अंदर भूख हो। भूख चाहे खाने की हो या किसी और चीज़ की, ये इंसान से कुछ भी करवा लेती है.. ये बात तो आप भी अच्छी तरह से जानते हैं। 

आखिर में नंबर आता है डिसिप्लिन का। हो सकता है की आपके अंदर जोश और भूख हो, पर यदि आप अनुशासित नहीं हैं तो आप सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। अनुशासन के लिए मन को काबू करना पढता है। 
"किसी भी फील्ड में मुकाम हासिल करने के लिए लाइफ में डिसिप्लिन होना बहुत जरूरी है।"
बिना अनुशासन के आप काम को बीच में छोड़कर दूसरी बातों में लग सकते हैं। लक्ष्य से भटकने पर अनुशासन ही आपको सही राह पर ला सकता है..   



Monday, 28 April 2014

कुछ पीछे छूटे हमराहियों कि याद में




इन अन्जानी राहों में, कुछ अनजाने गम हैं,
सब कुछ है पास अब, फ़िर भी तनहा हम हैं,
हर ख़ुशी अधूरी है, जो तुम सब नहीं ज़िन्दगी में,
क्यूंकि, आज इस ज़िन्दगी में कुछ शख्स कम है।।

आज फिर से वही एहसास, ज़हन मैं लौट कर आया है,
भूल चुके थे जिन्हे हम, आज लगा उन्ही का साया है,
आज भी याद है वो दिन, जब हमारी राहें बदली थी,
जब वक़्त ने कहा की उठ जा, अब जाने का समय आया है।।

पता ही नहीं चला कि, कुछ पल में हम सब इतनी दूर हो गए,
ऐसा भी क्या हुआ की, एक दूसरे से दूर जाने को मजबूर हो गये,
 इस रंगीन दुनिया से तुम सब ने, खुद ही नाता तोड़ लिया,
और ऐसा लगा जैसे, यहाँ हर रंग खुद हमारी ज़िन्दगी से दूर हो गए।।

सबके घरों में रंग थे, सिर्फ़ हमारे बाग़बान के फूल ही बेरंग थे,
हर तरफ खुशियाँ थीं, और यहाँ तो दिल के रास्ते ही तंग थे,
ये  माना कि ज़िन्दगी तो आगे बढ़ती रहेगी, पर वो बात कहाँ,
इसकी तो रौनक और बात ही अलग थी, जब हम सब संग थे।।

आज फिर ये रंगीन मौसम है, और साथ तुम्हारी याद है,
तुम सब खुश रहो, बस यही मेरे दिल कि फ़रियाद है,
माना कि ज़िन्दगी में शायद अब, तुम चाह कर भी नहीं हो,
फिर भी हमारे जज़्बातों का शहर, तुम्हारी यादों से ये आबाद है।।

एक वादा है कि, हर रंग में हमेशा एक रंग तुम्हारा होगा,
ये कमी भी दूर हो ही जाएगी, जब हाथों में हाथ तुम्हारा होगा,
हक़ीकत का तो पता नहीं, पर यादों में हमे जरुर रखना,
और भी महफ़िले जमेगी कल, ग़र फिर से साथ तुम्हारा होगा।।


Monday, 14 April 2014

ज़िन्दगी यूँ ही रेत सी फिसलती जा रही है आजकल




वो पुरानी यादें, यूँही सिमटती जा रही है आजकल,
बस चंद लम्हों में, बिखरती जा रही है आजकल... 

एक चिंगारी उठा लाये थे कभी अपनी ही बेसुधी में,
वही आग बन कर हमें जला रही है आजकल... 

ये कदम तो पहले भी बहके हैं होश खो कर,
मगर, ये राहें खुद बहकती जा रही है आजकल... 

अच्छे और बुरे, ज़िन्दगी में लोग कितने ही मिले,
धुंधली सी एक याद होती जा रही है आजकल... 

जिस ज़मीं पर छोड़ आए थे निशाँ क़दमों के हम,
वो ज़मीं ही खिसकती जा रही है आजकल... 

याद शाम की कभी आना कोई हैरत नहीं मगर,
हर घड़ी उस शाम में ढ़लती जा रही है आजकल... 

ज़िन्दगी के थे कई मकसद हमारे भी अज़ीम मगर,
ज़िन्दगी यूँ ही रेत सी फिसलती जा रही है आजकल... 

Friday, 31 January 2014

किसी कि दुआओं ने आज फिर बचाया है




खुशियां औरों को दे कर, हमने ये इनाम कमाया है.. 
मिली जिनके दिल में जगह, उन्हें पलकों पर बिठाया है...

ये जानते हैं हम, कि वो सिर्फ एक साया है.. 
पर हमेशा उस सायें का ही पीछा करते खुद को पाया है... 

जिस ख्वाब को देख कर, कोई और ख्वाहिश ही ना रही.. 
पूरी ज़िन्दगी उसी एक ख्वाब ने रुलाया है... 

दिल में ही रह गया था, एक तमन्ना का नाम-ओ-निशाँ.. 
बस, वही मुझे फिर से अपने शहर खींच लाया है... 

हमारी आँखों का सुकून था, वो अजनबी चेहरा.. 
इसीलिए, हमने अपनी ख़ुशी से ये धोखा खाया है... 

आज दिल के उस दर्द को भी, मिला ही लिया इन लफ्ज़ो में.. 
तब कहीं जाकर, इन शब्दों में ये रंग आया है... 

सलामती का तो कोई रास्ता, था ही नहीं यारा.. 
मुझे तो किसी कि दुआओं ने आज फिर बचाया है... 

Wednesday, 25 December 2013

ये खाली पन्ने





में नहीं जानता कि, में क्यों लिखता हूँ,
बस, ये खाली पन्ने यूँ देखे नहीं जाते,
इनसे ही अपना अकेलापन बाट लेता हूँ.. 

मेरे ख़यालो का आइना हैं ये,
मेरी अनकही बातें, मेरे अनसुने जज़्बात हैं ये.. 
इन पर जो स्याही है,
मेरे सपनो, मेरे छुपे आंसू, मेरे दर्द, मेरे प्यार कि हैं.. 

इन पर में पूरी तरह आज़ाद हूँ,
इन पर न कोई रोक है, न कोई टोक.. 

कभी भर देता हूँ इन्हे, दिए कि लौ से,
कभी बारिश कि बूंदो से,
कभी बचपन कि यादों से,
कभी उस हसींन कि तारीफों से.. 

ये पन्ने कुछ जवाब नहीं देते,
बस सुन लेते हैं मेरी बात,
क़ैद कर लेते हैं खुद में,
"मेरी दुनिया, मेरे जज़्बात"

किसी से कहते नहीं, किसी को बताते नहीं,
बस सम्भाल कर रखते हैं मेरी अमानत को,
मेरी कहानियों को, मेरी रवानियों को,
मेरी बातों को.. 

ये सही-गलत का भेद नहीं करते,
न अच्छे का, न बुरे का
इन पर न कुछ झूठ है, न सच.. 

कुछ यादें लेकर बिखर चुके हैं ये,
कुछ यादें अब भी संजोये हैं,
कुछ कहानिया और बाकी हैं मेरी,
जो इनमे मिल जाएँगी, और यादें बन जाएँगी..

कुछ किस्से और बाकी हैं मेरे,
जो मेरे जाने के बाद भी रहेंगे,
जो कभी खो जायेंगे, कभी मिल जायेंगे,
किसी को, कभी मेरी याद दिलाएंगे..

के था एक नादान लिखने वाला,
जो दुनियांदारी छोड़ कर,
इन पन्नों के प्यार में पढ़ गया.. 

इन्ही पन्नो में उसकी हमसफ़र कि बातें थी,
इन्ही पन्नो में उसके यारो के क़िस्से,
इन्ही पन्नो में वो आज़ाद रहा,
इन्ही पन्नो में वो क़ैद,
इन्ही पन्नो पर रोशन हुआ,
और फिर इन्ही पन्नो में डूब गया..

Thursday, 28 November 2013

मिट्टी के बदन पर, क्या इतराना




यादों कि महफ़िल, दिन-रात सजाना,
दर्द के मारो का तो ये है, काम पुराना ।। 

क्यों पूछते हो हमसे, दिल का पता,
भटकते हुए बेघरो का है, क्या ठिकाना ।।

डूबने वालो कि तरफ, देखता भी नहीं,
उगते हुए सूरज का पुजारी है, ये ज़माना ।।

थी बस एक आदमी कि, गलती वहाँ,
पर देखो सर झुकाए बैठा है, सारा घराना ।।

बना है मिट्टी से, आदमी ये "सुमीत"
मिट्टी के बदन पर, क्या इतराना ।।

Friday, 22 November 2013

सोचिये और सोच की सीमा तय करिये




हर चीज की सीमा निर्धारित होनी चाहिए। जैसे रोजाना के जीवन में खाने-पीने काम करने, दौड़ भाग करने, खेलने-कूदने, मनोरंजन आदि सबकी सीमा निर्धारित हो, तो समय का सही नियोजन और उपयोग होगा। समय ही जीवन है। एक-एक क्षण मिलकर जीवन बनता है। जीवन थोक नहीं है, चिल्हरों से बनता है जैसे एक-एक पैसे से रुपया फिर रुपये से सौ, हजार, लाख, करोड़ बनते हैं तो सब इकाई से शुरू होता है इसी तरह जीवन है एक-एक सोच मतलब रखती है।
सोच का संग्रह ही लेखन है, उद्बोधन है, कार्य है चाहे जिस क्षेत्र में हो सब एक सोच से प्रारंभ होता है। अब इसमें आता है सही दिशा में सही सोच जिसे सकारात्मक सोच कहते हैं। गलत दिशा में सोचा गया तो उसे नकारात्मक सोच कहते हैं। पर हम समय प्रबंधन, व्यवसाय या नौकरी प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन और अन्य कई प्रबंधन जो जीवन में होते हैं या हम करते हैं वे सब सोच से प्रारंभ होते हैं। हमें सोच की सीमा तय करना आना चाहिए। कोई सदस्य घर का बीमार है हमें सोचना है उसके इलाज के बारे में, डॉक्टर दवा के बारे में उसे सांत्वना देना है कि कोई बात नहीं, जल्दी ठीक हो जाओगे यदि हम सोचते ही रहे कुछ नहीं किया तो सोच चिंता में बदल जायेगा एक चिन्ता घुसी मन में तो वह अपने पूरे रिश्तेदारों को बुला लेती है भय, मोह, आसक्ति, हड़बड़ी आदि।
मैंने एक डॉक्टर को अपनी विवाहिता पुत्री के डिलवरी पेन दर्द के समय इतना चिंतित भयभीत और हड़बड़ी करते देखा कि मुझे आश्चर्य हुआ कि ये कैसे डॉक्टर हैं जो घर के एक सदस्य के प्रसूति दर्द से इतने परेशान हो गये तो मरीज या उसके सदस्यों का क्या हाल हुआ होगा। मैं मानता हूं कि डॉक्टर भी आखिर इंसान होता है पर उसे इतनी जल्दी घबराना नहीं चाहिए। वह अपने मरीजों को कैसे दिलासा देगा। हर चीज की सीमा तय होनी चाहिए। सीमा से बाहर उसका प्रभाव ऋणात्मक हो सकता है। ऋणात्मकता बहुत नुकसान दायक है, आपके पूरे वजूद को हिला देती है। हम पर हमारा मन ही शासन करता है उसे सुधार लें सकारात्मकता से भर लें तो सब ठीक हो जायेगा।
प्रसिध्द प्रवचनकार सुधांशु महाराज ने कहा है कि, चिन्ता मत करें चिन्तन करें और व्यथा को स्थान न दें व्यवस्था करें। छोटे-छोटे से शब्द हैं पर जीवन को नया मतलब देते हैं। यही तो है जीवन प्रबंधन जिस पर महान चिन्तक  विजयशंकरजी मेहता हमेशा बोलते लिखते रहते हैं। उनकी किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। सब कुछ उपलब्ध है दुनिया में अच्छे विचार, अच्छी किताबें, अच्छे लोग, अच्छे कैसेट, रेडियो, टी.व्ही. के कुछ चैनल आस्था और संस्कार अच्छी चीजें परोस रहे हैं। आपको शांत रहकर पढ़ना-सुनना, सोचना करना, चलना है तो ही आप मंजिल पर पहुंचेंगे। बस कोशिश करिये। सोचिये और सोच की सीमा तय करिये। अच्छी सोच बढ़ाइए, घटिया सोच को घटा कर शून्य कर दीजिए, बस यही मेरा संदेश है।

Tuesday, 19 November 2013

ज़िन्दगी कि धुप में यारा, ये ही सहारा है..




आसमान के हर पंछी में, भाई-चारा है,
ज़मीन पर, हर बात का बटवारा है..

उसका घर, मेरे घर से है ऊँचा क्यों,
इस बात पर, भाई ने भाई को मारा है..

कोई चढ़ता है, तो उठा लेते हैं सीढ़ी,
किसी का चढ़ना, हमें कब ग़वारा है..

ना  पाने कि ख़ुशी है, और ना खोने का ग़म,
कितना खुशनसीब, दुनिया में बंजारा है.. 

किस मोड़ पर आयी है, ज़िन्दगी कि कश्ती,
डूब रहे हैं हम, और सामने किनारा है..

वो खुश था कि, जीत गया दिल कि बाज़ी,
बहते आंसुओं ने कहा, कि तू हारा है..

फैला है सर पर, माँ कि छाव का आँचल,
ज़िन्दगी कि धुप में यारा, ये ही सहारा है.. 

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